नज़र है तो नज़ारा भी होगा। सफर है तो गुज़ारा भी होगा। वक्त किसी की बपौती नहीं, तुम्हारा है, हमारा भी होगा। कुछ चित्र गोदे हैं ह्रदय पर, इक रंग उनमें तुम्हारा भी होगा। उठती है लहरियाँ सिंधु में तो क्या, तकता राह वो किनारा भी होगा।
जो बीत जाता है उससे न जाने क्यों लगाव हो जाता है. नवोदय में विद्यार्थियों को न तो कोई अधिकार है न ही उनकी कोई सुनता है. यह जानते हुए भी कि मेस उनका हक़ है वे इंसानों के खाने लायक खाना बने इसके लिए नहीं बोल सकते. अगर बोलते हैं तो वे दंगे करने वाले कहलाते हैं. जबकि होना ये चाहिए कि शिकायत पर सुधार हो. पर शिक्षक गण कभी शायद ये नहीं सोच पाते कि जिस प्रकार उनकी संतानों कोअच्छा खाने का हक़ है वही हक़ विद्यार्थियों का भी है.मुझे याद है कई बार मुझे कई शिक्षकों ने बोला है-"पोहे में कोक्रोच दिखाते हो कभी घर पे खाया है निम्बू डाल के पोहा? कभी घर पे पनीर खाई है?" और ये सब सच होने के कारण मुझे लगता था कि जो मिल रहा है खा लेना चाहिए ये स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन हम जैसे भूखे नंगों पे उपकार कर रहा है. मुझे क्या पता था कि विद्यालय प्रशासन ऐसा इसलिए कर रहा है कि विद्यार्थी आवाज न उठायें और मन का धन किया जा सके. अभिभावक गण भी सोचते हैं कि शिक्षक उनके बच्चे की शिकायत कर रहे हैं तो बच्चा उद्दंड ही होगा. और दूसरी बात अभिभावकों को धमकी भी दी जाती है TC देने की अतैव फाइन के नाम पर हजारों पैसे भी वसूल लिए ज...
घसीटा आज उत्साह में था. जल्दी जल्दी मचा के सारा घर सिर पे उठा रखा था. और क्यों न उठाये आज स्कूल का पहला दिन जो था. बब्बी और उसके दोस्तों को रोज बैग लेके स्कूल जाते देखता और खुद के बड़े हो जाने की और एक बड़े बैग के साथ स्कूल जाने की कल्पना करता. स्कूल जाने का सपना तो आज सच होने वाला था पर बैग के लिए पूछा तो पापा ने सीधा बोल दिया - “बोरी का थैला ले जा. मैंने बारवीं तक की पढाई में उसी से काम चलाया. और तुझे पहले दिन से ही बैग चाहिए? पैसे हो जायेंगे तो बैग भी आ जायेगा. और हाँ कापी-वापी कुछ नहीं मिलेगी सलेट-बरतनी से सीख !” अब करता क्या? मन मार के थैला उठाया, उसमें सलेट भरी और रुआंसी शकल बना के खड़ा हो गया. इतने में बब्बी ने पुकारा – “घसीटा ! ओये टेम हो गया बे, स्कूल नहीं जाना क्या ?” दरअसल घसीटा के पिताजी ने बब्बी को बोल दिया था कि जब भी स्कूल जाए तो घसीटा को साथ ले ले और स्कूल में भी सही किलास में बिठा दे. बब्बी की आवाज सुनते ही घसीटा थैला लेकर बाहर दौड़ा. माँ पीछे-पीछे दौड़ी. बाहर ही घसीटा को रोका और धोती के छोर में बंधा एक रुपये का सिक्का घसीटा को देते हुए बोली – “ले एक रुपये का कुछ खा लेना. ...
यदि हम अपने परिवेश में नज़र दौड़ाएँ तो विभिन्न प्रकार के रंग, विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु, विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ, विभिन्न प्रकार के पदार्थ और ऐसी अनंत विभिन्न प्रकार की विभिन्नताएँ दृष्टिगोचर होतीं हैं। ब्रह्माण्ड विभिन्नताओं से भरा हुआ है। और यही कारण है कि यह इतना सुखद, रंगीन एवं मनोरम लगता है। विभिन्नताओं से रहित संसार की कल्पना कर पाना मुश्किल है। मैं आजतक ऐसी कल्पना नहीं कर पाया। अतः विभिन्नताएँ प्रकृति में अनिवार्य भी हैं और वांछित भी। एक इकाई का किसी दूसरी इकाई से भेद उन दोनों इकाइयों को पहचान देता है। यही पहचान हमारे वैयक्तिक अस्तित्व का स्तम्भ है। अगर हम पहचान खो देंगे तो हमारा वैयक्तिक अस्तित्व मिट जायेगा, और सटीक शब्दों में कहूँ तो 'अस्तित्व' का कोई अर्थ नहीं बचेगा। अतः व्यक्ति-व्यक्ति में भेद है इसीलिए उनका व्यक्तिगत अस्तित्व है। तो फिर यहाँ प्रश्न उठता है कि भेद मिटाने की बात क्यों कही जाती है ? क्यों कोई महापुरुष ऐसा कहता है कि रंग,जाति, लिंग आदि का भेद नहीं होना चाहिए ? समरूपता कि बात क्यों की जाती जिसे पाना असंभव-सा है ? पुरुष-स्त्री के शाश्वत भेदों को मानने...
सके जान न राम अचानक, खेद क्रोध में बदल गया। भीषणता धधकी-भभकी, धर रौद्र काल ज्यों जल गया। खिंचने लगी भृगुटि राम की, रक्त उबाल लगा भरने। भुजगेश बने, फुंफकार भरी, जग त्राहि-त्राहि लगा करने। दिनकर का जैसे रथ टूटा, इक क्षण भर की ही देरी में। ज्वालामुखी उद्विग्न हो उठे, हुई रात प्रलय की भेरी में। खौल रहे नदियाँ-निर्झर, अब डोल रहा अंचल-अंचल। पृथ्वी से नभ, नभ से भू तक, बेचैन निरंतर दौड़ रहा जल। पवन जगाता अलख नज़ारे, ...
मित्रो, 'सीता की याद' नाम से एक एक काव्य-श्रृंखला का आरम्भ कर रहा हूँ जिसकी पहली क़िस्त आपको समर्पित है। इस पूरी शृंखला की कविताएँ सीता के धरती में समां जाने के बाद राम की मनः स्थिति को अंकित करने का एक प्रयास है। कथावस्तु वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के 98वें एवं 99वें दो सर्गों से ली गई है। अगली क़िस्त कब आएगी मुझे भी नहीं पता। ( :P ) कविताओं का आनंद लें और कृपया सुझाव देते रहें ताकि उत्तरोत्तर किस्तें उन्नत हो सकें। धन्यवाद जिसने पति के चरणों में, सर्वस्व निछावर कर डाला। जिसने महलों की सेज छोड़, वन के कांटो में बिस्तर डाला। जिसने झूठी अफ़वाहों के, बोझ तले सब गवा दिया। जिसने तप की घोर अग्नि में. रोम-रोम निज जला दिया। जिसने सोने की लंका को, ...