तैत्तिरीयोपनिषद

कृष्ण यजुर्वेद शाखा का यह उपनिषद तैत्तिरीय आरण्यक का एक भाग है। इस आरण्यक के सातवें, आठवें और नौवें अध्यायों को ही उपनिषद की मान्यता प्राप्त हैं इस उपनिषद के रचयिता तैत्तिरि ऋषि थे। इसमें तीन वल्लियां- ‘शिक्षावल्ली,’ ‘ब्रह्मानन्दवल्ली’ और ‘भृगुवल्ली’ हैं। इन तीन वल्लियों को क्रमश: बारह, नौ तथ दस अनुवाकों में विभाजित किया गया है। जो साधक ‘ज्ञान,’ ‘कर्म’ और उपासना’ के द्वारा इस भवसागर से पार उतर कर मोक्ष की प्राप्ति करता है अथवा योगिक-साधना के द्वारा ‘ब्रह्म’ के तीन ‘वैश्वानर’, ‘तेजस’ और ‘प्रज्ञान’ स्वरूपों को जान पाता है और सच्चिदानन्द स्वरूप में अवगाहन करता है, वही ‘तित्तिरि’ है। वही मोक्ष का अधिकारी है।

शांति-पाठ

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः . शं नो भवत्यर्मा . शं न इन्द्रो बृहस्पतिः . शं नो विष्णुरुरुक्रमः . नमो ब्रह्मणे . नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षम् ब्रह्मासि . त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि . ऋतं वदिष्यामि . सत्यं वदिष्यामि . तन्मामवतु . तद्वक्तारमवतु . अवतु माम् . अवतु वक्तारम् . ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः .

मित्र – दिन और प्राण के अधिष्ठाता
वरुण- रात्रि और अपान के अधिष्ठाता
अर्यमा- सूर्य
इन्द्र- इन्द्रदेव, बल के अधिष्ठाता
बृहस्पति- वाणी और बुद्धि के अधिष्ठाता
विष्णु- विष्णु
ब्रह्मदेव- ब्रह्मा
शं- कल्यानप्रद
वक्तारं- उपदेशक
अवतु- रक्षा करें

प्रथम वल्ली – शीक्षा वल्ली

प्रथम अनुवाक्

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः . शं नो भवत्यर्मा . शं न इन्द्रो बृहस्पतिः . शं नो विष्णुरुरुक्रमः . नमो ब्रह्मणे . नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षम् ब्रह्मासि . त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि . ऋतं वदिष्यामि . सत्यं वदिष्यामि . तन्मामवतु . तद्वक्तारमवतु . अवतु माम् . अवतु वक्तारम् . ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः .

मित्र – दिन और प्राण के अधिष्ठाता
वरुण- रात्रि और अपान के अधिष्ठाता
अर्यमा- सूर्य
इन्द्र- इन्द्रदेव, बल के अधिष्ठाता
बृहस्पति- वाणी और बुद्धि के अधिष्ठाता
विष्णु- विष्णु
ब्रह्मदेव- ब्रह्मा
शं- कल्यानप्रद
वक्तारं- उपदेशक
अवतु- रक्षा करें

द्वितीय अनुवाक्

शीक्षां व्याख्यास्यामः . वर्णः स्वरः . मात्रा बलं . साम संतानः . इत्युक्तः शीक्षाध्यायः .
इत्युक्तः शीक्षाध्यायः – इस प्रकार वेद के उच्चारण की शिक्षा का अध्याय कहा गया .
शिक्षा के सार तत्त्व- वर्ण, स्वर, मात्रा, बल (प्रयत्न), साम (गान), संतानः (सन्धि)

तृतीय अनुवाक्

सह नौ यशः . सह नौ ब्रह्मवर्चसं . अथातः संहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः . पन्च्स्वधिकर्णेषु . अधिलोकमधिज्योतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मं . ता महासंहिता इत्याचक्षते .
अधिलोकं . पृथिवी पूर्वरूपं . द्यौरुत्तररूपं . आकाशः संधिः . वायुः संधानं . इत्यधिलोकं .
अथाधिज्योतिषं . अग्नि पूर्वरूपं . आदित्य उत्तररूपं . आपः संधिः . विद्युतः संधानं . इत्यधिज्यौतिषं .
अथाधिविद्यं . आचार्यः पूर्वरूपं . अन्तेवास्युत्तररूपं . विद्या संधिः . प्रवचनं संधानं . इत्यधिविद्यं .
अथाधिप्रजं . माता पूर्वरूपं . पितोत्तररूपं . प्रजा संधिः . प्रजनन संधानं . इत्यधिप्रजं .
अथाध्यात्मं . अधरा हनुः पूर्वरूपं . उत्तरा हनुः उत्तररूपं . वाक् संधिः . इत्यध्यात्मम् .
इतीसा महासंहिता य एवमेता महासंहिता व्याख्याता वेद . संधीयते प्रजया पशुभिः . ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन स्वर्गेण लोकेन .


तत्तरियोपनिषद

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