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नैनन की हुसियारी

आज लड़ी उनसे अखियाँ, सखियाँ बतियाँ कर जान निकारी।  गागर आज भई हलकी, छलकी उमगी भरजोर हुलारी।   बोल न बोल गए बलमा, बस नैनन तौल भई बनियारी।  लूट गओ हम खों बनिया, कर नैनन की हलकी हुसियारी।                                                                           -परमानंद  बनियारी = व्यापार, बनिया = व्यापारी 

सपरावत खीझ परी महतारी

पृष्ठभूमि:- आज भी वो दिन याद आ जाता है जब अम्मा बचपन में नहलाती थी। छंद:- मालती सवैया धूसर अंग धरे करिया, बनियान तने मल सी कर डारी। खेलत धूलि न भाँय करै, रत नाहिं घरै दिन-भोर-दुपारी। बाप दुलार बिगार  दिए, न उसार करे बनवै अधकारी। ऊ दिन खों अब याद करों, सपरावत खीझ परी महतारी।                                                                         -परमानंद  धूसर = धूल से सने, तने = तूने, भाँय = होश, रत = रहता, उसार = सेवा, खों = को, सपरावत = नहलाती, महतारी = माँ 

अपनी सजनी यह है परपाटी

पृष्ठभूमि:- रोड का काम प्रारम्भ होते ही मजदूर समुदाय में आशा जाग उठी। छंद:- मालती सवैया रामपुरा अब रोड डरे, चल री चल खोद भरें कछु माटी। काम करे कछु बात बने, अब भूखन जात न उम्मर काटी। राज लगे उनखों जिनकी, धन दौलत है जन की बरबादी। हाड़ गला नस खून बना, अपनी सजनी यह है परपाटी।                                                                        -परमानंद रामपुरा = एक गाँव का नाम, उनखों = उनको, हाड़ गला = हड्डियाँ गलाना 

आसुन आँस गई कतकी

विशेष :-  मालती सवैया नामक छंद का प्रयोग जिसमें सात भगण  ( S I I)  एवं अंत में दो गुरु वर्ण होते हैं। आसुन आँस गई कतकी, रब ने सजनी अब बादर फारे। जात किते अब खात किते, सनतान किते अब पालत बारे। सूद बढ़ै दिन रात अरी, जनु चाँद बढ़ै रजनी उजियारे। बीज बहाय लिए बरखा, सब नास कियो हरि पालनहारे। आसुन = इस वर्ष, आँस गई = खटक गई, कतकी = खरीफ की फसल, किते = कहाँ, सनतान = संतान, बारे = बालक 

हिम के पथरा

विशेष :-  मालती सवैया नामक छंद का प्रयोग जिसमे सात भगण  ( S I I)  एवं अंत में दो गुरु वर्ण होते हैं।  बादर से हिम के पथरा, बरसे हिरदे जब मार कटारी।  चारउ ओर भई चपटी, फसलें झकझोर सपट कर डारी।  ढोरन गातन खून बहै, कछु चोटन से दिहिया तज डारी।  थारन मूड़ ढके दुबके, 'परमा' अब रूठ गओ गिरधारी।  बादर = बादल, पथरा = पत्थर, चारउ = चारों, ढोरन = पशुधन के, गातन = अंगों में, चोटन = चोटों से, दिहिया = शरीर/देह, थारन = थालियों से, मूड़ = सिर

सजना बरयाने

पृष्ठभूमि:-  बुंदेलखंड के उस मजदूर परिवार की कल्पना करें जिसका मुखिया शराब पीता है और यहीं से जन्म लेती हैं गरीबी, भूख और घरेलू हिंसा जैसी गंभीर समस्याएँ। विशेष:-  प्रस्तुत छंद मालती सवैया है जिसके प्रत्येक चरण में सात भगण ( S I I)  एवं अंत में दो गुरु वर्ण होते हैं। खोरन ठोकर खात फिरै, ढुलकै-लुढकै नहि होस ठिकाने। रंजित नैनन खून चढ़ो, पतलून धरे सब कीच भिड़ाने। मारत, डारत तेल सखी, नहि लाज रखै सजना बरयाने। देख सराब खराब बला, 'परमा' अनवास न भौत खटाने। खोरन = गलियन, भिड़ाने = लथपथ, बरयाने = पागल हो जाना, अनवास = उपयोग करना/सेवन करना, खटाने = जिन्दा रहना