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छवि तेरी

लाख करूँ कोशिश पे तेरी छवि न मिटाई जाती है। पर्वत-निर्जन-धरती-अंबर बस दृष्टि तुम्हें ही पाती है। मानस अंकित सुधियों को कुरेद अनिल मुस्काती है। हँसती है मेधा देख-देख छलनी छवि को कर जाती है।

पन्ने पुराने हो गए

पीले पड़ गए पन्ने, ज़रा पुराने हो गए। महज अल्फ़ाज़ थे अब तराने हो गए। जरा मंथर हो गया है वक्त का कटना, मिलन के सिलसिले याद आने हो गए। चमक आती नहीं उतनी इन आंखों में, नूर छटा अब, तुझे देखे जमाने हो गए। तीर से जो चीरते, विंधते इस ह्रदय में, नयन के वे निशाने बे-निशाने हो गए। सुरूपे! ढूंढता अब भी खयालों में तुझे, पुरानी बात वो दिल के लगाने हो गए। 

मैं भूल गया

मैं भूल गया जीवन के सुंदर, और रंगीन नज़ारो मे। मैं भूल गया, मैं भटक गया, कलिओं की मस्त बहारो मे। प्यार दुलार की नौटंकी, अब भी छलती भरमाती है, जीना मुश्किल है दूर यहाँ, सुधियों के कारागारों में। मरता, मरकर भी खैर नहीं, ये यूँ ही पूजा जाता है, सोता है ऐसे प्रेम यहाँ, ज्यों सोता पीर मज़ारों में। तुम देखो वैसा ही पाओगे, जैसा मैं चिर से दिखता हूँ, पे होता पल पल परिवर्तित, ज्यों बदले रेत किनारों में।

माँगा था घना कोहरा

ह्रदय इक टीस सी उठती रही।  सुधि की रेख भी मिटती रही।  वक्त से माँगा था घना कोहरा, पौ फटी और धुंधी छटती रही।  भरम से पोतना चाहा जो दर्पण, शक्ल उसमे वही दिखती रही।  बिना समझे शुतुरमुर्गा बना मैं, गर्दन रेत में ही सदा धंसती रही।  चलाई छुरी, कि कटे तेरा जादू, पे साँसे ही मेरी कटती रही।

वक्त है जय घोष का

जब द्वंद के बिच्छू तुझे डसने लगे၊ जब तर्क तेरे भाव पर हंसने लगे। दिए की आग सा जलना पड़ेगा, कुटी को जब तिमिर छलने लगे। फागुन को विदा कहना ही होगा, कोई कली जादू अगर करने लगे। उषा की बांग तब देनी पड़ेगी, क्षितिज में सूर्य जब ढलने लगे। समझ ले वक्त है जय घोष का, मशाल-ए-जंग जब जलने लगे। - परमानंद

याद वो गीत आते हैं

हटते ह्रदय को फिर फिर लुभाना सीख जाते हैं। जिनसे आँख बचाता हूँ, दृश्य वो दीख जाते हैं। आँगन में रखा जो वक्त का धूमिल-सा तख्ता, ज़रा से रंग के छींटे नज़र इसमें भी आते हैं। दिशा से मुक्त हो पतवार ले खेता थका सा, हवा के मस्त झोंके फिर वहीं पे खींच लाते हैं। तेरी ढिठाई से भी कितने ढीठ हैं 'परमा' नहीं हैं गुनगुनाने जो, याद वो गीत आते हैं। 

कुछ लिखना जरूरी है

आज कुछ लिखना जरूरी है तपन में सिकना जरूरी है၊ दीदार का उतना महत है तेरा होना जितना जरूरी है। पलक के बांध से रोका हुआ जो  वह पानी रिसना जरूरी है၊ प्रेम होना ही नहीं पर्याप्त बाबू प्रेम का दिखना जरूरी है၊ आज इस बाजार में परमा बस तेरा बिकना जरूरी है၊

प्रेम का असली रूप विरह है

काग तेरी बोली में कैसी लय है। लगता है किसी का आज आना तय है। आग का तो जीवन धर्म जलना क्रूर जल की शीत आभा एक भय है। दिसि-ज्ञान बिन क्षितिज का लाल सूरज कौन जाने अस्त होता या उदय है। मिलन तो छल है रे विधाता का प्रेम का असली रूप विरह है। मजे हैं आँख के तपने में 'परमा' दीदार हो जाना ही तो क्षय है।                                           -परमानन्द 

सूरज से व्योम निकला

जो था पराया, वो अपना कौम निकला। शामक था जो, वो आखिर होम निकला। समझा था पत्थर जिसे अब तक, वो यूँ पिघला, कि मोम निकला। मद होगा सुरा सा ये सुना था, इस सुराही में तो मादक सोम निकला। व्योम से उगा करता था सूरज, आज सूरज से ज़रा सा व्योम निकला।

तुमसे ह्रदय हटाऊँ कैसे

मानस में उठती लहरों की, नीरस गाथा गाऊूँ कैसे। पनप रहे भोले अंकुर को कुचल के आगे जाऊँ कैसे। नेह लगा तुमसे वनिते ! इस बात को आज बताऊँ कैसे। रंग चढ़ा जिसमें गहरा, उस अंबर रंग चढ़ाऊँ कैसे। बिके हुए मन के मधुवन में, वंशी मधुर बजाऊँ कैसे। नजर हटाने तक वश मेरा, तुमसे ह्रदय हटाऊँ कैसे।                                                              -परमानंद मानस = मन, वनिते = एक लड़की के लिए सम्बोधन, अंबर = वस्त्र,

विरहिन की बरसात

ओ धरनी मोरी विरह की साथिन,  आग करेजे में धधकी। बारिश की पहली बुंदियन  पे ,  लेत  लपेटा दै भड़की।  अब सखी दादुर बोलन लागै ,  पूछ पुछार की दै छिटकी। प्रियतम नज़र नहीं कहूँ आवै ,  बैरन हवा घुसी खिड़की।    शीतल पवन चले आरी-सी ,  बदरा गरजै  घात करे।  अ ब की बार नहीं भींजूँगी ,  बूंदन-बूंदन तीर चले।  तू तो धरनी जनम की विरहिन ,  तैने कैसे धीर धरो।  मेरा विरह एक सावन का ,  तोकूँ सारो जनम धरो। तुम्हरे पिया तुम्हारे सम्मुख ,  नाम मिलन को नाहिं लियो।  मैं ही रुदन मचा वन लागी ,  तुम तो शाश्वत मौन लियो।                                                                    

प्रेम की मादकता

समीर 'समीर' को पत्र भयो ,मोहि मूक आमंत्रण प्रेम को डारो । मोहनी राग सुनो मम कान ,बुलाने पे जाने को मन   कर डारो । घन केश भए अनुरागिन के,अरु बेल बनी तब   चूनर   सुन्दर । पादप  झीने   वस्त्र   बने   है ,  यौवन   देह   बिलोकहु   अन्दर । प्रेमसुधा झरे आज झमाझम ,अलोकिक डोर से बाँध  लियो है । मोहि   बना   के  प्रेम दीवाना ,कुदरत   कैसो  खेल कियो है । या रस   पी  के   प्यास बुझे ना ,पवन   प्रेम  को रस ऐसो है । स्वाद चखो इसका अब तुम भी ,हरि के प्रेम को रस कैसो है । राधा ने  प्रेम  की  जोत जलाई ,पुंज प्रकाश को छोड़ दियो है । पुंज   के    उजियारे   में मैंने ,  सार  समंदर  देख  लियो है । प्रेम ही जग का सार है यारो ,प्रेम को आज स्वीकार कियो है । प्रेम निभाने    जग में आये ,प्रेम    लियो    है प्रेम   दियो है । प्रे म की मादकता  भई ऐसे ,जग को आज भुलाय   दियो है । "परमा...

प्रियतमा

चन्दन की खुसबू सी प्रिए तुम ;हवा में घुल के आती हो।  लिए   बहारे    ऋतुराज   की   ;जग   में  घु ल जाती हो।  सुध  आते  ही मधुर पलों की  ;रोम-रोम   झुमा    मेरा।  पूनम की शीतल रजनी तुम  ;फागुन का हो पाक सवेरा। याद तुम्हारी सावन की रिमझिम ;कभी बरसने लग जाती।  चातक बना पुकारूँ तुमको  ;तुम  बादल   सी छा  जाती।  कविओं की तुम कविता हो ; गायक   की  आवाज  प्रिये।  तुम चित्रकार का चित्र अजब हो ;कीमत है   बेमोल प्रिये।  यौवन  गागर  धरें  गुजरिया ;ज़रा सम्हल के चल प्यारी।  व्यर्थ न छलका गागर का जल ;भींग रही  नाजुक  साड़ी।  इस जल से ही हरा भरा है ; जग जीवन का सुन्दर उपवन। माली  को  है  गंध    फूल   की ;भ्रमर   करे   अंत:स्यंदन                                        ...

मैं अकेला कहाँ हूँ यारो

उन्होंने तो नजरें फेर ली ;अच्छा हुआ ये रम तो है । मैं अकेला कहाँ हूँ यारो ;मेरे साथ मेरा ग़म  तो है ।   चाँदनी में सजाए  थे जो सपने ;वो सपने मचल गए । उनकी राहों में बिछाया था ये दिल ;बेरहम हँसकर कुचल गए । दूर से देखा था वो किनारा ;वे थोडा आगे निकल गए । हम आये तो देखा साहिल को ;वे किनारे ही बदल गए । उनकी जुल्फों के घने बादल ;मेरी दुनिया में घिर आते हैं । हमें क्या पता था यारो ;ये बादल पानी नहीं बिजली गिराते हैं । हमें सूली पर चढ़ाया उन्होंने ;मोहब्बत पर हर दफ़ा क़यामत हुई । ख़ता ये थी कि शाही बगीचे के फूलों की महक; हमारे दिल से बरामद हुई । फूलों से कह दो की खिल उठें अब ;खुशियों का सवेरा हो गया । अब नहीं गूंजेगा गुंजार कोई ;चिरकाल को भँवरा सो गया । मुझे फ़क्र  है ये ज़ालिम तुझ पर ;तुम्हे मोहब्बत को कुचलने का दम तो है । मैं  अकेला कहाँ हूँ यारो; मरे साथ मेरा गम तो है ।

बस मे नाही नैन हमारे

खुले निहारे,बंद निहारे,बस मे नाही नैन हमारे। तुम-सी मोहनी मूरत रच के, विधि ने अपने हाथ संवारे।  केश ललित काले घुंघराले, पवन-वेग मे मतवाले।  सागर की मौजो के जैसे, लेत लहरिया भर किलकारे। नूर भरा निष्कलंक-स्वच्छ-जल सम, नैनो के 'मान-सरोवर' मे।  रति-पनिहारिन जल भरती नित , निज यौवन की गागर मे।  कोमल कपोल मुख कमाल की पांखें , भरी प्रेम संदेशो से।  नित   प्रभात मे कली चट कती,जिसकी मुस्कान के आदेशो से।  यूँ तो आँखो मे अगणित बा ते,पर लब पर आता जब जीवन का सुर।   कभी चपल चिड़ियो का कलरव , कभी कोकला-कूक मधुर।  जाने-अनजाने हिरनी ने , चाल तुम्हारी पाई है।  सहज नही है रत्न जवानी,यहाँ बहुत महेंगाई है ।   सम्मोहन का जादू डाला , मुझ बसंत के दीवाने पर।  तितली-सी उड़ चली हवा मे,निष्फिकर चलाती अपने पर।