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धरा धवल

धरा धवल धुली हुई जो धूल से बीमार थी. धूल से धमक उठी जो धूल की बयार थी. धूल धर्म धाम जिन्हे धूल ही बहार थी. धूल मे जो जा मिले वो धूल की पुकार थी. धूल के जो लाल थे वो धूल मे समा गये. धूल की ही आँधियों के बल हमें दिखा गये                                               -परमानंद 

समय जगाने आ गया

चीख-चीत्कार को , घोर अन्धकार को , नव प्रभात खा गया । समय जगाने आ  गया ।                    वनिते ! देख ज़रा ; आसमान साफ़ है । अंशुमन की लालिमा से  पूर्व का क्षितिज भरा । माँ की कोख में तुझे , अब कोई डर नहीं ।                     हत्यारों के हाथ की ,                         खैर अब नहीं रही ।                     किलकारियों से बेटियों की, सुख-वितान छा गया । समय जगाने आ गया । जमाने से न त्रिये डर , सामना ह्रदय से कर । तुझमे लक्ष्मीबाई है, वीरांगना अवंतिका । और दूजी ओर तू ही , प्रेम-पूरित लतिका । प्रेम के बदले ए बसंत , प्रेम ले के आ गया । समय जगाने आ गया । ...

युवाओं से

जग जीवन में जंग छिड गई ;तरकश तीर कमानी की।  ध्वज फहरा दो आज विजय का ;लेकर तोप जवानी की।  शिरा -धमनिया दृढ रख कर के ;रूधिर की रफ़्तार बढ़ा दो।  खबरदार ! अब ध्यान न डोले ; लक्ष्य में अपनी आँख गड़ा दो।  तीर नुकीले  बरस   रहे    है  ;झट प्रत्यंचा तुम्ही चढ़ा लो।  नहले    पे    दहले    है देना ;रण   में छाती  आज अड़ा दो।  डर मत जाना खून बहे जब ;नदिया   जैसे   पानी    की।  ध्वज फहरा दो आज विजय का ;लेकर तोप जवानी की।  क्यों भूल गए सब कुछ यारो ;कुछ याद करो, कुछ याद करो।  असीम शक्ति के निज सागर से ;कहो हिलोरे आज भरो।  अंत:     में    पसर    गया    है ; उस डर को तुम दूर करो।  तुम पे नजर टिकी भारत की ; दुखिओं   के   संताप   हरो।  भ्रमर  छोड़ दो मोह फूल का  ;बहुदिन से मनमानी की।  ध्वज फहरा दो आज विजय का ;लेकर तोप जवानी की।  कमर कसी  है मैंने अपनी ;...

विलाप क्यों

असफलताओं  से विक्षिप्त पुरुष ,किसका रोना रोता है।  करमो मे जो जंग लग गए,क्या करुणा से उनको धोता है।   खोल के आँखे देख ज़रा तू,है प्रश्न-दल से घिरा हुआ।  तू ही चीख रहा तेरे अंदर,न सुन पाता! क्या बहरा हुआ? बोए क्या तूने थे विचार के, उत्तम उपचारित बीज नए? क्यों आशा मे है नव अंकुर की, दिन सात गए तुम सठ भए।   हाँ ! कि उत्तर हाँ मे था ,और अंकुर अपनी थां पे था।  तो बता मुझे ओ मलिन कर्म ! सींचा क्या उसको जाँ से था? तू नही सिंचाई कर पाया पर, करूंणामय बादल को झरते देखा।  हवा बसंती की लहरों को , फसलों मे भरते देखा।  तू भूल गया जीवन के सुंदर , और रंगीन नज़ारो मे।   तू भूल गया ,तू भटक गया , कलिओं की मस्त बहारो मे।   तू गया तो था खेतों पर बसने , रक्षा करने निज फसल की।    बड़ी देर भई ओ मनमौजी , बनी शिकार वो पशुदल की।  अब बैठ अकेले सिर लटकाए , बर्बादी मे रोता है।   "क्यो दर्द दिया मुझको ईश्वर",आज दुहाई देता है।   देख उठा उपर सिर को , किसका हाथ रखा सिर पर।  किसके आँसू ने सहलाया तुझको, तेरे क...