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सुधियाँ जो सुहानी नहीं

जो बीत जाता है उससे न जाने क्यों लगाव हो जाता है. नवोदय में विद्यार्थियों को न तो कोई अधिकार है न ही उनकी कोई सुनता है. यह जानते हुए भी कि मेस उनका हक़ है वे इंसानों के खाने लायक खाना बने इसके लिए नहीं बोल सकते. अगर बोलते हैं तो वे दंगे करने वाले कहलाते हैं. जबकि होना ये चाहिए कि शिकायत पर सुधार हो. पर शिक्षक गण कभी शायद ये नहीं सोच पाते कि जिस प्रकार उनकी संतानों कोअच्छा खाने का हक़ है वही हक़ विद्यार्थियों का भी है.मुझे याद है कई बार मुझे कई शिक्षकों ने बोला है-"पोहे में कोक्रोच दिखाते हो कभी घर पे खाया है निम्बू डाल के पोहा? कभी घर पे पनीर खाई है?" और ये सब सच होने के कारण मुझे लगता था कि जो मिल रहा है खा लेना चाहिए ये स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन हम जैसे भूखे नंगों पे उपकार कर रहा है. मुझे क्या पता था कि विद्यालय प्रशासन ऐसा इसलिए कर रहा है कि विद्यार्थी आवाज न उठायें और मन का धन किया जा सके. अभिभावक गण भी सोचते हैं कि शिक्षक उनके बच्चे की शिकायत कर रहे हैं तो बच्चा उद्दंड ही होगा. और दूसरी बात अभिभावकों को धमकी भी दी जाती है TC देने की अतैव फाइन के नाम पर हजारों पैसे भी वसूल लिए ज...

जवाहर नवोदय विद्यालय - टेढ़ी दृष्टि

जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) मेरे जैसे कई लोगो के लिए एक ऐसा नाम है जिसने उन्हें आकार दिया। तराश-तराश कर बड़ी सिद्धत से खाका खिंचा और उस पर नक्काशी की और कुम्हार-गड़ा की मिट्टी राख के साथ तपकर सबसे महेंगे बिकने वाले घड़ों में शोभायमान हुई। धूल-धंखड़ से तलाश के कुछ कणों को माणिक्यों जवाहरातों का रूप देने वाली संस्था नवोदय ही है। माटी से निर्मित नवोदय की इन कलाकृतियों में आप ताउम्र माटी की गंध पाएंगे - यही है इस कारीगर की उतकृष्ट कला। इस तरह ह्रदय सुरम्य सुधियों में विलीन होता जाता है और महिमा-मंडन की अंतहीन सुरमाला हम नवोदयोत्पादों को लपेटती जाती है, लपेटती जाती है। मैं इस क्षेत्र में किसी भी बिंदु पर थकता नहीं। इसी बीच दब जाती हैं कुछ महत्वपूर्ण परंतु कड़वी सुधियाँ जिन्हें हम बाद में भी कभी नही देख पाते और अपने अनुजों के नेत्रों पर भी काली पट्टी जड़ देने के अनवरत प्रयास करते हैं। १) पता नही क्यों, परंतु कुछ कुलीन अध्यापक/अध्यापिकाएँ नवोदय में पढ़ने वाले बच्चों को उनकी समाज के बच्चों के बराबर का दर्ज़ा नही दे पाते। कितने भी प्रतिभाशाली बच्चे हों, वो रहेंगे गवार और उपेक्षा के पात्र ही। २) ब...

शनिवार को बघार

छन्द : कवित्त कल है आराम सन्डे ,नौगाँव से लाये अंडे , आज शनिवार को ,बघार जो लगत है। धना ,मिर्च व मसाले ,मेस से चुराए सारे , सौ-सौ जतन करे ,रात भर जगत है । येन-केन-प्रकारेन पंगत में बैठ गए , आ परे सर कोई ,होश अब उडत है । 'परमानन्द'भाग ले सबहि बिथर गए , आह रे वो सुवाद , चोट अब करत है ।                                    -परमानंद 

नवोदय की होली

जब-जब गूंजे इन कानों में ; होली के किलकारे । तब-तब जी उठते यादों के ; सुन्दर से गलियारे । उत्साहित हो बाहर आ जाते ; कर के झटपट नेत्र-निमीलन । सारे साथी खड़े ग्राउंड में ; हैप्पी होली रंग मिलन । चुपचाप खड़े हो मेस देखता ; नवोदय की होली-लीला । पांच सैकड़े लोग इकट्ठे ; तिस पर डी जे भड भड़कीला । अनंत ख़ुशी खिल उठी रंग की, चंद झडकियों पर ही । मौक़ा पाकर अजमा लेते , कुछ रंग लड़कियों पर भी । रंग-गुलाल से भूत बने ,कछु मंच पे नाच लगे करने । कछु दौड़े कछु पीछू धावै ,सबकी जेब लगे हरने । जेब-फाड़ आन्दोलन ' भैया ,न कौनो की जेब बचे । फिर पकर धरें गड्ढे माहीं ,कीचड़ से सुन्दर देह रचे । कछु 'स्कूल बिल्डिंग' को दौड़ पड़े, कछु जंगल की गैल धरी। साथ से सत्तर लगे ढुढैय्या, मिल जाबे तो खैर नहीं । गिरत पडत जात,  भागत भगत जात । देखत न आन-ताव , शूलहु चुभत जात ।  ढूंढ़त खुर्राए बांकी,  पंक से आपंक भये । पंक के खिलाड़ियन की, टीम अब बढ़त जात । याद है वो  दहन होलिका ,जी भर नाचे खोये से ।   "कल छूट जायेगी स्वर्ग-धरा ये "  फूट-फूट कर रोये थे...

यादों का धुंधलका

खुद को यादों से खींचता हुआ , भावनाओं को आंसुओं से सींचता हुआ। मैं छत पर टहल रहा हूँ, इक दावानल में दहल रहा हूँ। वो राव सर की मानवता, वो कामिनी मैडम का थप्पड़ , वो गिल्ली-डंडा का मैच, और नंदू की आँख में गिल्ली का लगना। "भाईसाब! ऐसे कैसे हो जायेगा ?" -संदीप सर दिमाग में भँवरे की तरह मन्नाते हैं , चुपके से रो ले शब के सन्नाटे ये सन्नाते हैं। बलवीर सर की सीटी, योगा के साथ पीटी। तब भी सताती थी और अब भी , तब होने से, अब न होने से। नवोदय के कण-कण में, हवा में, नज़ारों में, लड़कों की आपसी अल्हड़ता में, प्यार में , तकरार में, शिक्षकों की वाणी में , अंजाना सा आकर्षण घुला है; जो आज रुलाने पे तुला है। यादों का सिंधु, बनकर के जल-बिंदु , अब गाल तक उत्तर आया। तब याद कुछ इतर आया। जोशी सर की क्लास, कसमसाता सा उलास। -"छाया मत छूना, मन होगा दुःख दूना"                                                               ...