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सीता की याद: भाग २ (क्रोध)

सके जान न राम अचानक,                       खेद क्रोध में बदल गया। भीषणता धधकी-भभकी,                 धर रौद्र काल ज्यों जल गया। खिंचने लगी भृगुटि राम की,                         रक्त उबाल लगा भरने। भुजगेश बने, फुंफकार भरी,                    जग त्राहि-त्राहि लगा करने। दिनकर का जैसे रथ टूटा,                   इक क्षण भर की ही देरी में। ज्वालामुखी उद्विग्न हो उठे,                     हुई रात प्रलय की भेरी में। खौल रहे नदियाँ-निर्झर,                अब डोल रहा अंचल-अंचल। पृथ्वी से नभ, नभ से भू तक,                 बेचैन निरंतर दौड़ रहा जल। पवन जगाता अलख नज़ारे,     ...

सीता की याद: भाग १ (धिक्कार)

 मित्रो, 'सीता की याद' नाम से एक एक काव्य-श्रृंखला का आरम्भ कर रहा हूँ जिसकी पहली क़िस्त आपको समर्पित है। इस पूरी शृंखला की कविताएँ सीता के धरती में समां जाने के बाद राम की मनः स्थिति को अंकित करने का एक प्रयास है। कथावस्तु वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के 98वें  एवं 99वें दो सर्गों से ली गई है। अगली क़िस्त कब आएगी मुझे भी नहीं पता। ( :P ) कविताओं का आनंद लें और कृपया सुझाव देते रहें ताकि उत्तरोत्तर किस्तें उन्नत हो सकें। धन्यवाद जिसने पति के चरणों में,                सर्वस्व निछावर कर डाला। जिसने महलों की सेज छोड़,                वन के कांटो में बिस्तर डाला। जिसने झूठी अफ़वाहों के,                     बोझ तले सब गवा दिया। जिसने तप की घोर अग्नि में.                    रोम-रोम निज जला दिया। जिसने सोने की लंका को,              ...