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Showing posts from January, 2015

धरा धवल

धरा धवल धुली हुई जो धूल से बीमार थी. धूल से धमक उठी जो धूल की बयार थी. धूल धर्म धाम जिन्हे धूल ही बहार थी. धूल मे जो जा मिले वो धूल की पुकार थी. धूल के जो लाल थे वो धूल मे समा गये. धूल की ही आँधियों के बल हमें दिखा गये                                               -परमानंद 

पिता

ग़म का सागर भर के अंदर , दुःख की रेख छिपाते हैं। पलकों में बंध  नैन के आंसू , नैनो में अकुलाते हैं। माँ के नैना पल में झरते , अपने दुःख दिखलाते हैं। दुःख के भाव पिता का सुदृढ़ , बाँध तोड़ नहीं पाते हैं। ओले पड़ते जब राहों में , पिता छत्र बन जाते हैं। भव सागर में केवट बन के , सुत की नाव चलाते हैं। धर के रूप पिता का जग में , निराकार प्रभु आते हैं। मूरख 'परमा' तेरे हरि  भी , पितु को ईश बताते हैं                                                      -परमानन्द

भारत तेरी कहानी

कोई बेबस है,कोई बेघर है,कोई निवस्त्रे घूम रहे।  कहीं सिजियान पे नींद न आवै ,कहीं जमीनें चूम रहे।  कहीं बटर में ब्रेड न भावै,कहीं टुकड़ियन तरस रहे। कहीं दुबक रहे तन पाँवन में,सर पे ओले बरस रहे।  मधुर पवन के कहीं पे झोंके,कहीं पे झंझा पानी।  अरे ! विडम्बना से तर-तर है भारत तेरी कहानी।                                                          -परमानंद  

यह जग उलझन माहि

रे परमा ! यह जग उलझन माहि. पग-पग उलझन,हर डग उलझन. बिगड़े उलझन,बने तो उलझन. मोह बना तोरा बैरी मूरख,सुलझन ढूंढत नाहि. रे मूरख ! यह जग उलझन माहि.                               -परमानंद