Posts

बस मे नाही नैन हमारे

खुले निहारे,बंद निहारे,बस मे नाही नैन हमारे। तुम-सी मोहनी मूरत रच के, विधि ने अपने हाथ संवारे।  केश ललित काले घुंघराले, पवन-वेग मे मतवाले।  सागर की मौजो के जैसे, लेत लहरिया भर किलकारे। नूर भरा निष्कलंक-स्वच्छ-जल सम, नैनो के 'मान-सरोवर' मे।  रति-पनिहारिन जल भरती नित , निज यौवन की गागर मे।  कोमल कपोल मुख कमाल की पांखें , भरी प्रेम संदेशो से।  नित   प्रभात मे कली चट कती,जिसकी मुस्कान के आदेशो से।  यूँ तो आँखो मे अगणित बा ते,पर लब पर आता जब जीवन का सुर।   कभी चपल चिड़ियो का कलरव , कभी कोकला-कूक मधुर।  जाने-अनजाने हिरनी ने , चाल तुम्हारी पाई है।  सहज नही है रत्न जवानी,यहाँ बहुत महेंगाई है ।   सम्मोहन का जादू डाला , मुझ बसंत के दीवाने पर।  तितली-सी उड़ चली हवा मे,निष्फिकर चलाती अपने पर।  

मधुकर

रस न दीखै रसनालय में, रस न दीखै रचनालय में, रे मन! तू दीखै भस्मालय में।  मधुकर न लगा रास में, मधुकर न लगा बस में, तो समझो मधु कर न लगा उसके।  मधु की धारा मधुकर, मधु न धारा मधुकर, क्या कर डारा मधुकर।  जा मधुकर, पा मधु कर, मधु को कर दे शर्कर।  -परमानन्द 

यादों का धुंधलका

खुद को यादों से खींचता हुआ , भावनाओं को आंसुओं से सींचता हुआ। मैं छत पर टहल रहा हूँ, इक दावानल में दहल रहा हूँ। वो राव सर की मानवता, वो कामिनी मैडम का थप्पड़ , वो गिल्ली-डंडा का मैच, और नंदू की आँख में गिल्ली का लगना। "भाईसाब! ऐसे कैसे हो जायेगा ?" -संदीप सर दिमाग में भँवरे की तरह मन्नाते हैं , चुपके से रो ले शब के सन्नाटे ये सन्नाते हैं। बलवीर सर की सीटी, योगा के साथ पीटी। तब भी सताती थी और अब भी , तब होने से, अब न होने से। नवोदय के कण-कण में, हवा में, नज़ारों में, लड़कों की आपसी अल्हड़ता में, प्यार में , तकरार में, शिक्षकों की वाणी में , अंजाना सा आकर्षण घुला है; जो आज रुलाने पे तुला है। यादों का सिंधु, बनकर के जल-बिंदु , अब गाल तक उत्तर आया। तब याद कुछ इतर आया। जोशी सर की क्लास, कसमसाता सा उलास। -"छाया मत छूना, मन होगा दुःख दूना"                                                               ...