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बुन्देलखंड जल संकट

धमका परो जेठ के मास, पानी टटम गाँव में नैयाँ। दस दस डब्बा साइकल टांगें चले जाट गैलारे। ओरन-ढोरन की न पूछो, फिर रए जीवन हारे।  धरनी रए गई है मो फार, पानी टटम गाँव में नैयाँ।  धमका परो जेठ के मास, पानी टटम गाँव में नैयाँ। हेंचत पानी परे फफोला, ढोवत गर्दन टूटी।  सपने भी पानी के आवै, ऐसी किस्मत फूटी।  'परमा' इते जिओ ना जाए, पानी टटम गांव में नैयाँ। धमका परो जेठ के मास, पानी टटम गाँव में नैयाँ।

पिंजरा धरो इतइ रए जाने

पिंजरा धरो इतइ रए जाने, पंछी उड़ जाने तत्काल। नाते घरी भरे के लाने, जे संग तोरे नई जाने; आँखी मिंचत नज़र नई आने, माया को सबरो जंजाल।  जो नित-नित होत पुरानो, अरे,मरम  न तेने जानो; पिंजरा काये तोए मिठानो, जी में है नइयां सर-स्वाद। भीतर बैठी जोन चिरैया, उको कछु भरोसो नइयां; 'परमा' मानत काये नइयां, भज ले बृजमोहन बृजलाल। 

Proposal for Lohagad Fort Trek

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हिंदी के लिए  यहां  क्लिक करें Brief Information Fort: Lohagad Region: Lonavala Height: 3389ft. Grade: Easy Location History  Lohagad has a long history with several dynasties occupying it at different periods of time: Satavahanas, Chalukyas, Rashtrakutas, Yadavas, Bahamanis, Nizams, Mughals and Marathas. Shivaji captured it in 1648 CE, but he was forced to surrender it to Mughals  in 1665 CE by the Treaty of Purandar. Shivaji recaptured the fort in 1670 CE and used it for keeping his treasury.  Tentative Schedule 06:14 AM - Board Indrayani Express at Thane 08:00 AM - At Lonavla Up to 10:00 AM - Breakfast and then  Bjaja Caves   10:00 AM - Ascending 12:00 PM - At the Fort 02:00 PM - Descending  03:20 PM - Lohagad Wadi 05:00 PM - At Malavli Station (have to catch 5:37 local train to lonavala) 06:00 PM - At Lonavala (Local may be 10 to 20 min. late) 07:25 PM - Board Indrayani Express for Mumbai ...

विरहिन की बरसात

ओ धरनी मोरी विरह की साथिन,  आग करेजे में धधकी। बारिश की पहली बुंदियन  पे ,  लेत  लपेटा दै भड़की।  अब सखी दादुर बोलन लागै ,  पूछ पुछार की दै छिटकी। प्रियतम नज़र नहीं कहूँ आवै ,  बैरन हवा घुसी खिड़की।    शीतल पवन चले आरी-सी ,  बदरा गरजै  घात करे।  अ ब की बार नहीं भींजूँगी ,  बूंदन-बूंदन तीर चले।  तू तो धरनी जनम की विरहिन ,  तैने कैसे धीर धरो।  मेरा विरह एक सावन का ,  तोकूँ सारो जनम धरो। तुम्हरे पिया तुम्हारे सम्मुख ,  नाम मिलन को नाहिं लियो।  मैं ही रुदन मचा वन लागी ,  तुम तो शाश्वत मौन लियो।                                                                    

महाकाव्य : फौजी

सर्ग-एक ईश्वर-नमन पहिले सुमरों परमेश्वर को ,देवी देवता लेव मनाय । कलम विराजो माँ सुर-देवी ,ज्ञान की स्याही दो फैलाय । झन-झन वीणा तान सुना दे ,सबदन में अब भाव रमा दे । निज बालक पे चितवन दारो ,नवरस से इह काव सजा दे । ज्ञानोसुर की महानिधि है जो ,तेरे मानस के सागर में । वो सागर से इक बुंदिया-सी ,जलनिधि दे दो मम गागर में । आ के माँ मेरे मन-मंदिर में,काव्य का अमृत आज फुहारों । कर दीजो सफल सुरीलो कारज ,शीश नवावत लाल तुम्हारो ।                   कुण्डलिया ग्राम “मढैया” सुख बसा ,उर्मिल नद के पार । जम्बू दीपे भरत खंडे  ,आजादी के बाद । आजादी के बाद ,सब नीको चले कामा  । हरे खेत झूमते ,  इ सुखद सुरीलो धामा । वामन क्षत्रीय वैश्य सब सुख से करते काम । एक झलकिया  देख लो चलो मढैया ग्राम ।         सरसी-छंद यही लोग के बीच में कछु ,रहते ऐसे लोग । सदियों से भोगते आये ,जीवन महा कठोर। आज ऋण में गले से डूबे ,आजादी के बाद । इनसे पूछ लेव कैसा है ,आजादी का ...

नवोदय की होली

जब-जब गूंजे इन कानों में ; होली के किलकारे । तब-तब जी उठते यादों के ; सुन्दर से गलियारे । उत्साहित हो बाहर आ जाते ; कर के झटपट नेत्र-निमीलन । सारे साथी खड़े ग्राउंड में ; हैप्पी होली रंग मिलन । चुपचाप खड़े हो मेस देखता ; नवोदय की होली-लीला । पांच सैकड़े लोग इकट्ठे ; तिस पर डी जे भड भड़कीला । अनंत ख़ुशी खिल उठी रंग की, चंद झडकियों पर ही । मौक़ा पाकर अजमा लेते , कुछ रंग लड़कियों पर भी । रंग-गुलाल से भूत बने ,कछु मंच पे नाच लगे करने । कछु दौड़े कछु पीछू धावै ,सबकी जेब लगे हरने । जेब-फाड़ आन्दोलन ' भैया ,न कौनो की जेब बचे । फिर पकर धरें गड्ढे माहीं ,कीचड़ से सुन्दर देह रचे । कछु 'स्कूल बिल्डिंग' को दौड़ पड़े, कछु जंगल की गैल धरी। साथ से सत्तर लगे ढुढैय्या, मिल जाबे तो खैर नहीं । गिरत पडत जात,  भागत भगत जात । देखत न आन-ताव , शूलहु चुभत जात ।  ढूंढ़त खुर्राए बांकी,  पंक से आपंक भये । पंक के खिलाड़ियन की, टीम अब बढ़त जात । याद है वो  दहन होलिका ,जी भर नाचे खोये से ।   "कल छूट जायेगी स्वर्ग-धरा ये "  फूट-फूट कर रोये थे...

जीवन की क्षण-भंगुरता

शीर्षक          : जीवन की क्षण-भंगुरता   छंद              : रुचिरा (मात्रिक) छंद-संरचना  : १६,१४                         १६,१४                         अंत में एक गुरू।   पवन जगाता अलख नज़ारे , चमक  दामिनी अम्बर में। खलबल खलबल सिन्धु हो रहा ,प्राण काल  के है कर में। नीर-समीर  मिले   तब  ऐसे , बरसों  बिछड़े  यार  मिले। क्रुद्ध  धुंध  की  आतुर  बाहें , जीव  अजीव  अलिंगन  ले। निर्दय दानव सिन्धु हो रहा ,निगलनलगा जलयान को। अब  तक  समझ नही पाया रे ,प्रभु के विप्लव-गान को। चटख  सुंदरी  माधव  गढ़ की , बन  के  मॉडल  दंभ करे। विलय  हो  रही  जल में काया , रक्त  उदधि  में रंग भरे। अतिवादी!  आतंक  तुम्हारा , था  तुच्छ इस आतंक से। सता ...