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जीवन की क्षण-भंगुरता

शीर्षक          : जीवन की क्षण-भंगुरता   छंद              : रुचिरा (मात्रिक) छंद-संरचना  : १६,१४                         १६,१४                         अंत में एक गुरू।   पवन जगाता अलख नज़ारे , चमक  दामिनी अम्बर में। खलबल खलबल सिन्धु हो रहा ,प्राण काल  के है कर में। नीर-समीर  मिले   तब  ऐसे , बरसों  बिछड़े  यार  मिले। क्रुद्ध  धुंध  की  आतुर  बाहें , जीव  अजीव  अलिंगन  ले। निर्दय दानव सिन्धु हो रहा ,निगलनलगा जलयान को। अब  तक  समझ नही पाया रे ,प्रभु के विप्लव-गान को। चटख  सुंदरी  माधव  गढ़ की , बन  के  मॉडल  दंभ करे। विलय  हो  रही  जल में काया , रक्त  उदधि  में रंग भरे। अतिवादी!  आतंक  तुम्हारा , था  तुच्छ इस आतंक से। सता ...

अजातशत्रु

        छंद-                 सरसी  छंद संरचना -  १६,११                             १६,११                            अंत में गुरु-लघु (sl )  मैं मृदुवाचक बना हुआ था ,अंत: कपट समाय | अजातशत्रु मैं खुद को समझू ,छाती दंभ छिपाय | श्याम सखा अन्दर  से बोला , काहे फूला जाय | क्रोध,मोह,आलस्य,दंभ-से,रिपु को भूला जाय ||1|| अजातशत्रु तू तभी बने जब ,क्रोध क्षमा बन जाय | नादानी के अपराध सहे ,खड़ा-खड़ा मुस्काय | अजातशत्रु तू तभी बनेगा ,मोह बने जब त्याग | वंचित को अपने हिस्से से ,सौंपेगा कुछ भाग ||2|| अजातशत्रु तू तभी बने जब ,आलस हो असहाय | किस्मत के अभिलेख भूलकर ,कर्म ध्वजा फहराय | मधुसूदन का कर्म-संदेसा ,जन-जन तक पहुचाय | वही निर्भय हो भाग्य रेख से ,रिपु-विहीन कहलाय ||3|| 'दंभ नहीं ' - इस दंभ में  खोय , दंभ करे तू घोर | प्रेम ...

स्वारथ की झांकी है

छंद: ताटंक  ओ   मनवा !  रिश्तेदारों  से ,दूर  रहें तो  प्यारे  हैं | साथ  गुंथने  से  दुःख  बढ़े ,अपने  भी कुप्यारे हैं | प्यार दुलार सबै नौटंकी ,मेल-मिलाप छलावा है | ये स्वारथ की सब झांकी  ,या मन का बहलावा है |

माया का जाल

छन्द: कुण्डलिया या माया का जाल है ,करे चुटीले घात। 'परमा' तुम मूरख भये ,फिर फिर फसने जात। फिर फिर फसने जात , मोह के फांस निराले। करे किसी से दूर , किसी को गले लगा ले। देख मान सनमान , तु फूला नहीं समाया। आँख सुबुधि की खोल , तज दे मोह या माया। 

नव-वर्ष

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिवस पर लगभग ..1 अरब, 96 करोड़... वर्ष (1 अरब, 95 करोड़, 58 लाख, 85 हजार, 125 ) पहले इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की शुरुआत का दिन तय किया, इसलिए इसे प्रतिपदा कहा गया अर्थात प्रथम पग या पद ... पहली तिथि । यह गणना भारतीय ज्योतिष-विज्ञान के द्वारा निर्मित है। आधुनिक वैज्ञानिक भी अब सृष्टि की उत्पत्ति का समय एक अरब वर्ष से अधिक बता रहे है। इस दिन आदि-शक्ति के आदेश पर ब्रह्मा जी ने सूर्योदय होने पर सबसे पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को  सृष्टि की संरचना शुरू की। इसलिए इसको सृष्टि का प्रथम दिवस भी कहते हैं। इस दिन को 'नव संवत्सर' या 'नव संवत' के नाम से भी जाना जाता है| सूर्य को वत्स कहा गया है ..आदित्य ..आदि-शक्ति, आदि-प्रकृति अदिति का वत्स; प्रथम आदित्य ...प्रथम सूर्योदय से ही नव वर्ष प्रारम्भ माना गया जो चक्रीय व्यवस्था से प्रतिवर्ष उसी प्रकार नववर्ष का प्रारम्भ करेगा ...अतः संवत्सर कहा गया... चैत्रे मासि जगत्‌ ब्रह्म ससर्ज प्रथमे हनि शुक्ल पक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति॥ चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या वर्ष ...

एक गाथा ऐसी भी

मुझे फिराया बहुत दिनों तक , नहीं लगती थी हाथ ।  मुझसे एक नहीं फसती थी , औरों से फंस जात ।  चंचल थी जल की भांति ' छनकीली सी देह ।  आज फसी है जाल में , अब नाही संदेह ।  ले चला में उसे चने के खेत में , जहां लगाईं घात ।  उज्जवल गाथा सुनो वहा की , मधुर चांदनी रात । ऐसा आज मसलू इसको , दिल की आग बुझाय । मखमल सी उस मेढ़ पे , इसे पटक दूँ जाय ।  पिंजरा खोला जाय खेत पर , इक दंभ भरे अहसास में ।  दै भागी वो चुहिया , गुम  हो गई उस घास में ।  बाल नोंचू माथा ठोकूं , उस दिन पछताया खेत पे ।  ' परमानन्द ' बहुत खीजा फिर , चुहिया से चेक-मेट पे । 

जग-गोकुल

जब सहज भाव की कलकल होती ; मन-यमुना के तीरे । ऐसो लागै श्याम पधारे  छुप के देख सखी रे । ओ मद-मस्त हवा , सुन कान लगा ; ज़रा सम्हल के जाना । तेरी आहट  से कहीं श्याम को; कोई भनक ना देना ।  देख ज़रा उन पुष्पों को , उस निर्मल सी शबनम को । शायद कान्हा वहाँ छिपा है, देख पात की थिरकन को। देख की शायद लुका कन्हैया  , नवजात शिशु की मुस्की में । भावना से ली जाय अगर तो, कान्हा चाय की चुस्की में । मधुवन, उपवन, सावन , रिमझिम , किसलय , कुसुम और वृक्ष लता में । नटखट नन्द-कुमार छुपा है , जीवन की इस चंचलता  में । मत सोच कि  कान्हा लुप्त हुआ  अब, वृन्दावन से गोकुल से । सारा जग अब गोकुल है रे, बाहर  झाँक ज़रा संकुल से । माँ की मधुमय वाणी से, जब गोपाल नजर तू आयो  रे । परमानन्द के श्याम सखा ! तब उर आनंद समायो  रे ।                               ---परमानंद