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जाड़ो लगो, भ्याने घर बना लेहो

नोट: बुंदेली वाक्य 'जाड़ो लगो, भ्याने घर बना लेहो' का हिदी अनुवाद है - 'बहुत ठण्ड है, सुबह होते ही घर बना लूँगी' __________________ रात का समय था। मौसम जाड़े का। घास के बिछौने ओस से गीले हो गए थे। पेड़ों की पत्तियाँ समेटी हुई संघनित जल-राशि को बड़ी कंजूसी से एक एक बूँद टपका रही थी। बाड़े में बंधी भैसें जुगाली कर रही थी। गेंगे, तोते, गौरइयाँ, कौए आदि पंछिओं ने चुप्पी साधी थी। बीच-बीच में उल्लू जरूर आवाज़ कर देता। बाड़े के पास ही छटपटाती कपकपाती एक लोमड़ी झाड़ियों में कुछ टटोलती सी तन ढकने का उपाय खोज रही थी। भैंसों के बाड़े में ही बूढ़ा हरिया खाट बिछाए दो-तीन कम्बल ताने सो रहा था। वह भैंसों की रक्षा के उद्देश्य से रोज बाड़े में ही सोता था। लोमड़ी की तो जैसे जान जा रही थी। उसे तन छुपाने को जगह न मिलती। दाँत कटकटाती जैसे कह रही है- "खो.... खो.... खो.. जाड़ो लगो, भ्याने घर बना लेहो" अंत में उसने आके हरिया की खाट के नीचे शरण ली। यहाँ कुछ ठीक था। इतने में झबरा कुत्ता भौंका, हरिया जागा, सिरहाने रखा बाँस का बेंत उठाया और दे मारा लोमड़ी के। वह भागी, हरिया गरियाता हुआ उसके पीछे भाग...

तुमसे ह्रदय हटाऊँ कैसे

मानस में उठती लहरों की, नीरस गाथा गाऊूँ कैसे। पनप रहे भोले अंकुर को कुचल के आगे जाऊँ कैसे। नेह लगा तुमसे वनिते ! इस बात को आज बताऊँ कैसे। रंग चढ़ा जिसमें गहरा, उस अंबर रंग चढ़ाऊँ कैसे। बिके हुए मन के मधुवन में, वंशी मधुर बजाऊँ कैसे। नजर हटाने तक वश मेरा, तुमसे ह्रदय हटाऊँ कैसे।                                                              -परमानंद मानस = मन, वनिते = एक लड़की के लिए सम्बोधन, अंबर = वस्त्र,

भय नहीं चिंघाड़ों का

तर्जनी उठा कर जो प्रलय के बोल घनेरे कहता है। सूचित कर दो उस कायर को रक्त यहाँ भी बहता है। शरम करो ये नमक हरामो, माटी भी शर्मिंदा है। चले काटने उसको जिसके, कोटिक बेटे जिन्दा हैं। सबर न तौलो तुम बन्दों का, मर्यादा में रहना रे।  उछल पड़ा जो खून खौलता, फिर न आके कहना रे। अगणित गर्जन सुन रखे हैं, भय नहीं चिंघाड़ों का। मस्तक अविरल उठा रहेगा, हिम से भरे पहाड़ों का। भारत है ये तेरे घर का रात्रि भोज का भात नहीं। गीदड़ हो गीदड़ ही रहना, सिंहों-सी औकात नहीं। -परमानंद

करकट के भात

विशेष - कविता की प्रत्येक पंक्ति में ३२ मात्राएँ हैं। ऐसे पाया हूँ भात अहो, जिसमें बहुतेरे स्वाद अहो। उन भोग-भोज में क्षुधा शांति का, कैसा था उन्माद कहो ? मड़राना पंकित माखिन का, या क्रंदन का था नाद कहो। विरदा न कहो उन कौरों की, जलदी भख लो चुपचाप रहो। कुछ स्वाद लगे है बलगम का, कुछ स्वानों के उत्सर्जन का। सड़ने कीड़े पड़ जाने से, फेंके केलों के दर्जन का। शायद मदिरा की उछरन का, सागंध अवतरण हुआ यहीं। नासिक के युगल प्रपातों का, जल होठों में गुम गया कहीं। घृणित ह्रदय उमड़ा करता पर, क्षुधा सदा मदमाती है। ललक-ललक कचरे का भोजन, खाने मजबूर बनाती है। दुत्कार तुझे उन झरनों की, और पंकित रंजित अंगों की। दुत्कार नहीं उन असुअन की, दुत्कार तुझे इन छंदों की।                                                                       --परमानंद 

बूढी आँखे

अंबर को तकती वे बूढी आँखे कहती है कथा निठुर नियति की  तब की, जब लाल पोतनी आसमान में, उषा चहक पोता करती . जब सावन में नन्ही बिटिया सी, बूंदे आँगन में नाचा करती . जब खेत पहन धानी पगड़ी, इठलाते थे इतराते थे . जब गन्ने के खेतो में छिप के, बाल मंडली घुस जाती थी . जब कूपों में पानी होता था , जब खाने को दाने होते थे , जब इन आखों के साथ अंग में, भी पुलक थिरका करती. जब सदा बसंती हृदयों में, प्रेम लहर उमड़ा करती. फिर आखें गीली हो जाती हैं; क्योंकि आधुनिक विकास की गर्मजोशी में बादलों के साथ ह्रदय भी सूख गए .

ऐसी होली खेल

न रंग चढ़े मोहे श्याम तुम्हारा ,न चढ़ पावै दुनिया का।   ऐसी होली खेल मेरे संग ,रंग चढ़े बस माटी का।   राष्ट्र-प्रेम की भंगिया पीकर , उसी प्रेम की फागें गाऊँ।   तीन रंग मुझ में घुल जावैं ,तीन रंग में मैं घुल जाऊँ।                                                                                                                -परमानंद 

पचमढ़ी

जब इम्तिहान सर होते है, जब पुलक कहीं खो जाती है। जब निशा चिरौरी करती है, जब उषा धमक दहलाती है। जिस-बीच परीक्षा पर-इच्छा से कृष्ण रात सी छाती है। पचमढ़ी उदित हो नागमणी सी, तू दस्तक दे जाती है।