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नमामि जीवन धार गंगे

नमामि जीवन धार गंगे, नित नवल झंकार गंगे।  प्यासी धरा का मूक-न्यौता, कर सहज स्वीकार गंगे।  नित भगीरथ टेरते हैं, नाम तेरा फेरते हैं। शुष्क-निर्जल तप्त नैना  ओर तेरी हेरते हैं।  हम बुलाते शम्भु बाबा, हम मनाते शम्भु बाबा।  जन-जनावर एक सुर से, जय कि भोले शम्भु बाबा।  क्यों तनिक न तू ठहरती, क्यों तनिक न तू लहरती।  बेजान-सी होती धरा में, क्यों न थोड़े प्राण भरती।  है जो भीषण धार तेरी, क्या यहीं है हार मेरी? स्वार्थ-सेवित मूढ़ जन को, या कि ये दुत्कार तेरी।  या कि अब वो वन नहीं हैं, या कि काले घन नहीं हैं।  कर सकें सत्कार तेरा, या कि ऐसे जन नहीं हैं।  हम जो तेरे दिव्य बेटे, क्यों न हमको आन भेंटे। हम बनाएँ शिव-जटा जो, वेग को तेरे समेटे।  हम न उर में स्वार्थ धरते, नित सदा परमार्थ करते।  जो कि 'हलमा' तब किया था, वो ही बारंबार करते। 

सावनी

"सावनी वाले आएंगे आज। लड़कियों झाड़ू-वर्तन कर लो जल्दी से, मैं गोबर ले के आती हूँ। और सुन रे.. खेमचंद, चिल्ल-पों बिल्कुल नहीं चाहिए।" - माँ जल्दवाजी में कहते हुए सिर पे टोकरी रखकर फुरफुराती सी चली गई। उसके पास जैसे ज्यादा निर्देश देने का समय नहीं था। इधर मीरा और गुड्डन ने भी कह दिया - " हाँ माँ कर लेंगे, तू जा तो। दोनों का ध्यान तो चपेटा खेलने में था। खेमचंद कहीं से दौड़ता हुआ आया और दोनों के साथ बैठ गया। वह बहुत ध्यान से उनको चपेटा खेलते हुए देख रहा था। ऊपर जाते हुए गिट्टी के पत्थर (इस खेल में उस पत्थर का नाम चपेटा) को वो देखता तब तक गुड्डन नीचे चार पांच पत्थर (चपेटा) उठा लेती और खेमचंद की आंखें नीचे आने से पहले ही ऊपर का पत्थर गुड्डन के हाथ में होता। खेमचन्द की आँखों में चमक आ जाती। खेमचंद ने धीरे से कहा - "दीदी मैं भी खेलूँ तुम्हारे साथ?" दोनों में से किसी ने उत्तर न दिया। खेमचंद ने गुड्डन को हल्का सा धक्का देते हुए फिर पूछा। गुड्डन का ध्यान हटा और चपेटा उसके हाथ से गिर गया। उसने तपाक से एक तमाचा खेमचंद को जड़ दिया। खेमचंद दो-चार चपेटे उठा के रोटा हुआ भाग गया...

गाँव की याद

गाँव, खेत, कुआँ, धूल, चांदनी भैंस, लम्बू बेरी, झबरा कुत्ता, अनाज के डंठल, बरगद का पेड़, अमियाँ की चटनी, कैंथा का अचार, चिल्ला की चिल्ली, पलाश के चिया, खजरी का गावो, ऊमर की पंखी, जवन की गुड़ी, चुनी की रोटी, बैगन का भरता, इमली के चेउआ, जंगल-जलेबी, बेर का बिरचुन, आलू की बरी, बच्चों की चिल-पों, बड़ों की चौपाल, माँ, पिताजी, भाई, बहन, दोस्त, सब जैसे बुलाते हैं हर रोज़। सोचता हूँ - "क्या गोकुल ने कृष्ण को नहीं बुलाया होगा?" फिर मन मार के बैठ जाता हूँ...

हमारा भी होगा

नज़र है तो नज़ारा भी होगा। सफर है तो गुज़ारा भी होगा। वक्त किसी की बपौती नहीं, तुम्हारा है, हमारा भी होगा। कुछ चित्र गोदे हैं ह्रदय पर, इक रंग उनमें तुम्हारा भी होगा। उठती है लहरियाँ सिंधु में तो क्या, तकता राह वो किनारा भी होगा।

सुधियाँ जो सुहानी नहीं

जो बीत जाता है उससे न जाने क्यों लगाव हो जाता है. नवोदय में विद्यार्थियों को न तो कोई अधिकार है न ही उनकी कोई सुनता है. यह जानते हुए भी कि मेस उनका हक़ है वे इंसानों के खाने लायक खाना बने इसके लिए नहीं बोल सकते. अगर बोलते हैं तो वे दंगे करने वाले कहलाते हैं. जबकि होना ये चाहिए कि शिकायत पर सुधार हो. पर शिक्षक गण कभी शायद ये नहीं सोच पाते कि जिस प्रकार उनकी संतानों कोअच्छा खाने का हक़ है वही हक़ विद्यार्थियों का भी है.मुझे याद है कई बार मुझे कई शिक्षकों ने बोला है-"पोहे में कोक्रोच दिखाते हो कभी घर पे खाया है निम्बू डाल के पोहा? कभी घर पे पनीर खाई है?" और ये सब सच होने के कारण मुझे लगता था कि जो मिल रहा है खा लेना चाहिए ये स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन हम जैसे भूखे नंगों पे उपकार कर रहा है. मुझे क्या पता था कि विद्यालय प्रशासन ऐसा इसलिए कर रहा है कि विद्यार्थी आवाज न उठायें और मन का धन किया जा सके. अभिभावक गण भी सोचते हैं कि शिक्षक उनके बच्चे की शिकायत कर रहे हैं तो बच्चा उद्दंड ही होगा. और दूसरी बात अभिभावकों को धमकी भी दी जाती है TC देने की अतैव फाइन के नाम पर हजारों पैसे भी वसूल लिए ज...

स्कूल में पहला दिन

घसीटा आज उत्साह में था. जल्दी जल्दी मचा के सारा घर सिर पे उठा रखा था. और क्यों न उठाये आज स्कूल का पहला दिन जो था. बब्बी और उसके दोस्तों को रोज बैग लेके स्कूल जाते देखता और खुद के बड़े हो जाने की और एक बड़े बैग के साथ स्कूल जाने की कल्पना करता. स्कूल जाने का सपना तो आज सच होने वाला था पर बैग के लिए पूछा तो पापा ने सीधा बोल दिया - “बोरी का थैला ले जा. मैंने बारवीं तक की पढाई में उसी से काम चलाया. और तुझे पहले दिन से ही बैग चाहिए? पैसे हो जायेंगे तो बैग भी आ जायेगा. और हाँ कापी-वापी कुछ नहीं मिलेगी सलेट-बरतनी से सीख !” अब करता क्या? मन मार के थैला उठाया, उसमें सलेट भरी और रुआंसी शकल बना के खड़ा हो गया. इतने में बब्बी ने पुकारा – “घसीटा ! ओये टेम हो गया बे, स्कूल नहीं जाना क्या ?” दरअसल घसीटा के पिताजी ने बब्बी को बोल दिया था कि जब भी स्कूल जाए तो घसीटा को साथ ले ले और स्कूल में भी सही किलास में बिठा दे. बब्बी की आवाज सुनते ही घसीटा थैला लेकर बाहर दौड़ा. माँ पीछे-पीछे दौड़ी. बाहर ही घसीटा को रोका और धोती के छोर में बंधा एक रुपये का सिक्का घसीटा को देते हुए बोली – “ले एक रुपये का कुछ खा लेना. ...

भेद-अभेद

यदि हम अपने परिवेश में नज़र दौड़ाएँ तो विभिन्न प्रकार के रंग, विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु, विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ, विभिन्न प्रकार के पदार्थ और ऐसी अनंत विभिन्न प्रकार की विभिन्नताएँ दृष्टिगोचर होतीं हैं। ब्रह्माण्ड विभिन्नताओं से भरा हुआ है। और यही कारण है कि यह इतना सुखद, रंगीन एवं मनोरम लगता है। विभिन्नताओं से रहित संसार की कल्पना कर पाना मुश्किल है। मैं आजतक ऐसी कल्पना नहीं कर पाया। अतः विभिन्नताएँ प्रकृति में अनिवार्य भी हैं और वांछित भी। एक इकाई का किसी दूसरी इकाई से भेद उन दोनों इकाइयों को पहचान देता है। यही पहचान हमारे वैयक्तिक अस्तित्व का स्तम्भ है। अगर हम पहचान खो देंगे तो हमारा वैयक्तिक अस्तित्व मिट जायेगा, और सटीक शब्दों में कहूँ तो 'अस्तित्व' का कोई अर्थ नहीं बचेगा। अतः व्यक्ति-व्यक्ति में भेद है इसीलिए उनका व्यक्तिगत अस्तित्व है। तो फिर यहाँ प्रश्न उठता है कि भेद मिटाने की बात क्यों कही जाती है ? क्यों कोई महापुरुष ऐसा कहता है कि रंग,जाति, लिंग आदि का भेद नहीं होना चाहिए ? समरूपता कि बात क्यों की जाती जिसे पाना असंभव-सा है ? पुरुष-स्त्री के शाश्वत भेदों को मानने...