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सनातन में शूद्र

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कम्प्लीट वर्क ऑफ स्वामी विवेकानंद से कुछ उद्धरण 1. CW-4 2. CW-7 3. CW-6 4. CW-6 आदि शंकराचार्य का ब्रह्मसूत्र भाष्य ऊपर के उद्धरण पढ़कर अभी तक यह तो समझ या ही रहा है की स्वामी विवेकानंद जी ने आदि शंकराचार्य जी के साथ मतभेद प्रकट किए हैं और उनको 'ब्राह्मणवादी' कहा है। अतः यहाँ यह जानना आवश्यक हो जाता है कि शंकराचार्य जी ने ऐसी क्या बात कही और किस संदर्भ में कही कि स्वामी जी जिससे सहमत न हो पाए। आदि शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र भाष्य में न केवल जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था को माना है बल्कि उस आधार पर शूद्रों को वेदाध्ययन निषेध बताया है । ब्रह्मसूत्र, शांकरभाष्य, अध्याय-1, पाद-3, अपशूद्राधिकरणम्, सूत्र संख्या 34-38 : 34. शुगस्य    तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते    हि उसकी (हंस की) अनादरपूर्ण वाणी सुनकर दुखित होकर उसे (जनश्रुति) को आते देख (रैक्व) ने उसे (शूद्र कहकर) संबोधित किया। राजा जनश्रुति की कथा छान्दोग्य उपनिषद के चतुर्थ अध्याय मे आती है जिसे इस ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है। फिर भी संक्षेप मे यहाँ कह देता हूँ। दो हंस आकाश मे उड़ते हुए जा रहे थे । एक...

नमामि जीवन धार गंगे

नमामि जीवन धार गंगे, नित नवल झंकार गंगे।  प्यासी धरा का मूक-न्यौता, कर सहज स्वीकार गंगे।  नित भगीरथ टेरते हैं, नाम तेरा फेरते हैं। शुष्क-निर्जल तप्त नैना  ओर तेरी हेरते हैं।  हम बुलाते शम्भु बाबा, हम मनाते शम्भु बाबा।  जन-जनावर एक सुर से, जय कि भोले शम्भु बाबा।  क्यों तनिक न तू ठहरती, क्यों तनिक न तू लहरती।  बेजान-सी होती धरा में, क्यों न थोड़े प्राण भरती।  है जो भीषण धार तेरी, क्या यहीं है हार मेरी? स्वार्थ-सेवित मूढ़ जन को, या कि ये दुत्कार तेरी।  या कि अब वो वन नहीं हैं, या कि काले घन नहीं हैं।  कर सकें सत्कार तेरा, या कि ऐसे जन नहीं हैं।  हम जो तेरे दिव्य बेटे, क्यों न हमको आन भेंटे। हम बनाएँ शिव-जटा जो, वेग को तेरे समेटे।  हम न उर में स्वार्थ धरते, नित सदा परमार्थ करते।  जो कि 'हलमा' तब किया था, वो ही बारंबार करते। 

सावनी

"सावनी वाले आएंगे आज। लड़कियों झाड़ू-वर्तन कर लो जल्दी से, मैं गोबर ले के आती हूँ। और सुन रे.. खेमचंद, चिल्ल-पों बिल्कुल नहीं चाहिए।" - माँ जल्दवाजी में कहते हुए सिर पे टोकरी रखकर फुरफुराती सी चली गई। उसके पास जैसे ज्यादा निर्देश देने का समय नहीं था। इधर मीरा और गुड्डन ने भी कह दिया - " हाँ माँ कर लेंगे, तू जा तो। दोनों का ध्यान तो चपेटा खेलने में था। खेमचंद कहीं से दौड़ता हुआ आया और दोनों के साथ बैठ गया। वह बहुत ध्यान से उनको चपेटा खेलते हुए देख रहा था। ऊपर जाते हुए गिट्टी के पत्थर (इस खेल में उस पत्थर का नाम चपेटा) को वो देखता तब तक गुड्डन नीचे चार पांच पत्थर (चपेटा) उठा लेती और खेमचंद की आंखें नीचे आने से पहले ही ऊपर का पत्थर गुड्डन के हाथ में होता। खेमचन्द की आँखों में चमक आ जाती। खेमचंद ने धीरे से कहा - "दीदी मैं भी खेलूँ तुम्हारे साथ?" दोनों में से किसी ने उत्तर न दिया। खेमचंद ने गुड्डन को हल्का सा धक्का देते हुए फिर पूछा। गुड्डन का ध्यान हटा और चपेटा उसके हाथ से गिर गया। उसने तपाक से एक तमाचा खेमचंद को जड़ दिया। खेमचंद दो-चार चपेटे उठा के रोटा हुआ भाग गया...

गाँव की याद

गाँव, खेत, कुआँ, धूल, चांदनी भैंस, लम्बू बेरी, झबरा कुत्ता, अनाज के डंठल, बरगद का पेड़, अमियाँ की चटनी, कैंथा का अचार, चिल्ला की चिल्ली, पलाश के चिया, खजरी का गावो, ऊमर की पंखी, जवन की गुड़ी, चुनी की रोटी, बैगन का भरता, इमली के चेउआ, जंगल-जलेबी, बेर का बिरचुन, आलू की बरी, बच्चों की चिल-पों, बड़ों की चौपाल, माँ, पिताजी, भाई, बहन, दोस्त, सब जैसे बुलाते हैं हर रोज़। सोचता हूँ - "क्या गोकुल ने कृष्ण को नहीं बुलाया होगा?" फिर मन मार के बैठ जाता हूँ...

हमारा भी होगा

नज़र है तो नज़ारा भी होगा। सफर है तो गुज़ारा भी होगा। वक्त किसी की बपौती नहीं, तुम्हारा है, हमारा भी होगा। कुछ चित्र गोदे हैं ह्रदय पर, इक रंग उनमें तुम्हारा भी होगा। उठती है लहरियाँ सिंधु में तो क्या, तकता राह वो किनारा भी होगा।

सुधियाँ जो सुहानी नहीं

जो बीत जाता है उससे न जाने क्यों लगाव हो जाता है. नवोदय में विद्यार्थियों को न तो कोई अधिकार है न ही उनकी कोई सुनता है. यह जानते हुए भी कि मेस उनका हक़ है वे इंसानों के खाने लायक खाना बने इसके लिए नहीं बोल सकते. अगर बोलते हैं तो वे दंगे करने वाले कहलाते हैं. जबकि होना ये चाहिए कि शिकायत पर सुधार हो. पर शिक्षक गण कभी शायद ये नहीं सोच पाते कि जिस प्रकार उनकी संतानों कोअच्छा खाने का हक़ है वही हक़ विद्यार्थियों का भी है.मुझे याद है कई बार मुझे कई शिक्षकों ने बोला है-"पोहे में कोक्रोच दिखाते हो कभी घर पे खाया है निम्बू डाल के पोहा? कभी घर पे पनीर खाई है?" और ये सब सच होने के कारण मुझे लगता था कि जो मिल रहा है खा लेना चाहिए ये स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन हम जैसे भूखे नंगों पे उपकार कर रहा है. मुझे क्या पता था कि विद्यालय प्रशासन ऐसा इसलिए कर रहा है कि विद्यार्थी आवाज न उठायें और मन का धन किया जा सके. अभिभावक गण भी सोचते हैं कि शिक्षक उनके बच्चे की शिकायत कर रहे हैं तो बच्चा उद्दंड ही होगा. और दूसरी बात अभिभावकों को धमकी भी दी जाती है TC देने की अतैव फाइन के नाम पर हजारों पैसे भी वसूल लिए ज...

स्कूल में पहला दिन

घसीटा आज उत्साह में था. जल्दी जल्दी मचा के सारा घर सिर पे उठा रखा था. और क्यों न उठाये आज स्कूल का पहला दिन जो था. बब्बी और उसके दोस्तों को रोज बैग लेके स्कूल जाते देखता और खुद के बड़े हो जाने की और एक बड़े बैग के साथ स्कूल जाने की कल्पना करता. स्कूल जाने का सपना तो आज सच होने वाला था पर बैग के लिए पूछा तो पापा ने सीधा बोल दिया - “बोरी का थैला ले जा. मैंने बारवीं तक की पढाई में उसी से काम चलाया. और तुझे पहले दिन से ही बैग चाहिए? पैसे हो जायेंगे तो बैग भी आ जायेगा. और हाँ कापी-वापी कुछ नहीं मिलेगी सलेट-बरतनी से सीख !” अब करता क्या? मन मार के थैला उठाया, उसमें सलेट भरी और रुआंसी शकल बना के खड़ा हो गया. इतने में बब्बी ने पुकारा – “घसीटा ! ओये टेम हो गया बे, स्कूल नहीं जाना क्या ?” दरअसल घसीटा के पिताजी ने बब्बी को बोल दिया था कि जब भी स्कूल जाए तो घसीटा को साथ ले ले और स्कूल में भी सही किलास में बिठा दे. बब्बी की आवाज सुनते ही घसीटा थैला लेकर बाहर दौड़ा. माँ पीछे-पीछे दौड़ी. बाहर ही घसीटा को रोका और धोती के छोर में बंधा एक रुपये का सिक्का घसीटा को देते हुए बोली – “ले एक रुपये का कुछ खा लेना. ...

भेद-अभेद

यदि हम अपने परिवेश में नज़र दौड़ाएँ तो विभिन्न प्रकार के रंग, विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु, विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ, विभिन्न प्रकार के पदार्थ और ऐसी अनंत विभिन्न प्रकार की विभिन्नताएँ दृष्टिगोचर होतीं हैं। ब्रह्माण्ड विभिन्नताओं से भरा हुआ है। और यही कारण है कि यह इतना सुखद, रंगीन एवं मनोरम लगता है। विभिन्नताओं से रहित संसार की कल्पना कर पाना मुश्किल है। मैं आजतक ऐसी कल्पना नहीं कर पाया। अतः विभिन्नताएँ प्रकृति में अनिवार्य भी हैं और वांछित भी। एक इकाई का किसी दूसरी इकाई से भेद उन दोनों इकाइयों को पहचान देता है। यही पहचान हमारे वैयक्तिक अस्तित्व का स्तम्भ है। अगर हम पहचान खो देंगे तो हमारा वैयक्तिक अस्तित्व मिट जायेगा, और सटीक शब्दों में कहूँ तो 'अस्तित्व' का कोई अर्थ नहीं बचेगा। अतः व्यक्ति-व्यक्ति में भेद है इसीलिए उनका व्यक्तिगत अस्तित्व है। तो फिर यहाँ प्रश्न उठता है कि भेद मिटाने की बात क्यों कही जाती है ? क्यों कोई महापुरुष ऐसा कहता है कि रंग,जाति, लिंग आदि का भेद नहीं होना चाहिए ? समरूपता कि बात क्यों की जाती जिसे पाना असंभव-सा है ? पुरुष-स्त्री के शाश्वत भेदों को मानने...

सीता की याद: भाग २ (क्रोध)

सके जान न राम अचानक,                       खेद क्रोध में बदल गया। भीषणता धधकी-भभकी,                 धर रौद्र काल ज्यों जल गया। खिंचने लगी भृगुटि राम की,                         रक्त उबाल लगा भरने। भुजगेश बने, फुंफकार भरी,                    जग त्राहि-त्राहि लगा करने। दिनकर का जैसे रथ टूटा,                   इक क्षण भर की ही देरी में। ज्वालामुखी उद्विग्न हो उठे,                     हुई रात प्रलय की भेरी में। खौल रहे नदियाँ-निर्झर,                अब डोल रहा अंचल-अंचल। पृथ्वी से नभ, नभ से भू तक,                 बेचैन निरंतर दौड़ रहा जल। पवन जगाता अलख नज़ारे,     ...

वर्णन

ਆਖਹਿ ਵੇਦ ਪਾਠ ਪੁਰਾਣ ॥  ਆਖਹਿ ਪੜੇ ਕਰਹਿ ਵਿਖਆਣ ॥ ਆਖਹਿ ਬਰਮੇ ਆਖਹਿ ਇੰਦ ॥  ਆਖਹਿ ਗੋਪੀ ਤੈ ਗੋਵਿੰਦ ॥ ਆਖਹਿ ਈਸਰ ਆਖਹਿ ਸਿੱਧ ॥  ਆਖਹਿ ਕੇਤੇ ਕੀਤੇ ਬੁਧ ॥ ਆਖਹਿ ਦਾਨਵ ਆਖਿਹ ਦੇਵ ॥  ਆਖਹਿ ਸੁਰਿ ਨਰ ਮੁਨਿ ਜਨ ਸੇਵ ॥ ਕੇਤੇ ਆਖਹਿ ਆਖਿਣ ਪਾਹਿ ॥  ਕੇਤੇ ਕਹਿ ਕਹਿ ਉਠਿ ਉਠਿ ਜਾਹਿ ॥ ਏਤੇ ਕੀਤੇ ਹੋਰ ਕਰੇਹਿ ॥  ਤਾ ਆਖ ਨ ਸਕਹਿ ਕੇਈ ਕੇਇ ॥ ਜੇ ਕੋ ਆਖੈ ਬੋਲੁਵਿਗਾੜੁ ॥   ਤਾ ਲਿਖੀਐ ਸਿਰਿ ਗਾਵਾਰਾ ਗਾਵਾਰੁ॥ वरने वेद कहें पुराना। वरने सुविज्ञ करें वखाना। वरने ब्रह्मा वरने इन्द्र। वरने गोपी और गोविन्द। वरने शंकर वरने सिद्ध। वर्णत कितने आये बुद्ध। वरने दानव वरने देव। वरने सुर-नर-मुनि-जन-सेव। कितने वर्णत कह न पावै। कितने कह-कह उठ-उठ जावै। जितने जन्मे, और अगर आ जायेंगे। जो है वो कह नहीं पाएंगे। वर्णन का जो दावा करते। प्रकट मूढ़ता अपनी करते। वरने = वर्णन करें, सेव = सेवा करने वाले  -श्री गुरुग्रंथ साहिब, २६ #गुरुनानक_जयंती 

सीता की याद: भाग १ (धिक्कार)

 मित्रो, 'सीता की याद' नाम से एक एक काव्य-श्रृंखला का आरम्भ कर रहा हूँ जिसकी पहली क़िस्त आपको समर्पित है। इस पूरी शृंखला की कविताएँ सीता के धरती में समां जाने के बाद राम की मनः स्थिति को अंकित करने का एक प्रयास है। कथावस्तु वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के 98वें  एवं 99वें दो सर्गों से ली गई है। अगली क़िस्त कब आएगी मुझे भी नहीं पता। ( :P ) कविताओं का आनंद लें और कृपया सुझाव देते रहें ताकि उत्तरोत्तर किस्तें उन्नत हो सकें। धन्यवाद जिसने पति के चरणों में,                सर्वस्व निछावर कर डाला। जिसने महलों की सेज छोड़,                वन के कांटो में बिस्तर डाला। जिसने झूठी अफ़वाहों के,                     बोझ तले सब गवा दिया। जिसने तप की घोर अग्नि में.                    रोम-रोम निज जला दिया। जिसने सोने की लंका को,              ...

समझ नहीं आ रहा कौन-सी वाली डिसाइड करूँ

1 जनवरी और 1 जुलाई ऐसा दिन है जब ढेरों भारतियों का जन्मदिन होता है। क्यों होता है? ये अब किसी से छिपा नही हैं। मास्साब (teacher) की इस कृपा का एक पात्र मैं भी हूँ। हमें अपने जन्मदिन का पता ही अपनी पाँचवी की मार्कशीट से चलता है। हालाँकि जन्मदिन मनाने  के चक्कर में मैं ज्यादा पड़ा नहीं। मुझे दो या तीन बार का ही ऐसा कुछ याद है जब जन्मदिन मनाने जैसा कुछ किया गया। एक बार छठवीं कक्षा में चॉकलेट वितरण, एक बार तीन चार दोस्तों के साथ मिलकर शुद्ध जैन केक भंजन (केक एक मित्र ने उसके घर से मंगाया था, कक्षा नौवीं की बात) और तीसरी बार 2014 में जब घर पे था तो बहन द्वारा लाई गई जलेबियों का रसास्वादन। (उसे तो पता ही तब चला था जब मेरे मोबाइल पे उसने 1 जनवरी को कई दोस्तों के हैप्पी बर्थडे मैसेज देखे, और चट से ले आई जलेबियाँ). इन घटनाओं के आलावा मैंने कभी जन्मदिन नहीं मनाया। पिछली बार 2015 की दिवाली में सफ़ाई करते हुए मेरे भाई को पिताजी की पुरानी पॉकेट डायरी मिली जिसमें उन्होंने मेरी जन्म की दिनांक और समय नोट कर रखा था। पिताजी ने इस डायरी का जिक्र कई बार किया परंतु कभी इसके दर्शन न हुए थे। और उनको...

कल जिसे मैं खुद के साथ बिताया जाने वाला समय कहता आज था वो वैसा नही रहा

खुद के साथ बैठे काफी दिन हो गए। याद आता है- खेत की मेढ़, ढलता सूरज, चिड़ियों के झुण्ड, ढोर-डंगरों के चलने से मौसम में धुंध फैलाती धूल और घर की ओर ठेलता तेजी से पसरता हुआ अन्धकार। सिर पे टोकरी रखे दो तीन बकरियों को साथ लिए खेत से घर लौटती औरतें, बच्चे जिनके इर्द-गिर्द चिल्ल-पों मचाते बकरियों को तंग करते जैसे मजाक उड़ा रहे हों साँझ के गंभीर सन्नाटे का। ये वो समय होता था जब मैं खुद के साथ बैठा होता था। मन में न जाने कितने सवाल, कितनी दार्शनिक गुत्थियाँ किलोलें करती। सूरज भी साँझ के समय उताल में रहता है जैसे घर पास आ जाने पर छोटे-छोटे बच्चे उत्साह से दौड़कर किवाड़ भड़भड़ाते हुए दन्न से अंदर घुस जाते हैं। सूरज के छिपते ही कुछ मिनट का जो मरा मरा सा उजाला रहता है न। बस यही है वो वक़्त जब अंतर में छिपा दार्शनिक बाहर आने लगता है। इस गंभीरता में एक आनंद-सा आता है। मन जैसे धीरे-धीरे डूब रहा हो। जल से सांसो के द्वार जैसे बंद हो रहे हों। हर ओर से गति जैसे शांत हो कर विलीन हो रही हो। इस डूबने में तड़प नही उठती, न ही हैरान करती है उबरने की छटपटाहट। बस एक सनसनाता हुआ-सा संगीत...

जवाहर नवोदय विद्यालय - टेढ़ी दृष्टि

जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) मेरे जैसे कई लोगो के लिए एक ऐसा नाम है जिसने उन्हें आकार दिया। तराश-तराश कर बड़ी सिद्धत से खाका खिंचा और उस पर नक्काशी की और कुम्हार-गड़ा की मिट्टी राख के साथ तपकर सबसे महेंगे बिकने वाले घड़ों में शोभायमान हुई। धूल-धंखड़ से तलाश के कुछ कणों को माणिक्यों जवाहरातों का रूप देने वाली संस्था नवोदय ही है। माटी से निर्मित नवोदय की इन कलाकृतियों में आप ताउम्र माटी की गंध पाएंगे - यही है इस कारीगर की उतकृष्ट कला। इस तरह ह्रदय सुरम्य सुधियों में विलीन होता जाता है और महिमा-मंडन की अंतहीन सुरमाला हम नवोदयोत्पादों को लपेटती जाती है, लपेटती जाती है। मैं इस क्षेत्र में किसी भी बिंदु पर थकता नहीं। इसी बीच दब जाती हैं कुछ महत्वपूर्ण परंतु कड़वी सुधियाँ जिन्हें हम बाद में भी कभी नही देख पाते और अपने अनुजों के नेत्रों पर भी काली पट्टी जड़ देने के अनवरत प्रयास करते हैं। १) पता नही क्यों, परंतु कुछ कुलीन अध्यापक/अध्यापिकाएँ नवोदय में पढ़ने वाले बच्चों को उनकी समाज के बच्चों के बराबर का दर्ज़ा नही दे पाते। कितने भी प्रतिभाशाली बच्चे हों, वो रहेंगे गवार और उपेक्षा के पात्र ही। २) ब...

छवि तेरी

लाख करूँ कोशिश पे तेरी छवि न मिटाई जाती है। पर्वत-निर्जन-धरती-अंबर बस दृष्टि तुम्हें ही पाती है। मानस अंकित सुधियों को कुरेद अनिल मुस्काती है। हँसती है मेधा देख-देख छलनी छवि को कर जाती है।

पन्ने पुराने हो गए

पीले पड़ गए पन्ने, ज़रा पुराने हो गए। महज अल्फ़ाज़ थे अब तराने हो गए। जरा मंथर हो गया है वक्त का कटना, मिलन के सिलसिले याद आने हो गए। चमक आती नहीं उतनी इन आंखों में, नूर छटा अब, तुझे देखे जमाने हो गए। तीर से जो चीरते, विंधते इस ह्रदय में, नयन के वे निशाने बे-निशाने हो गए। सुरूपे! ढूंढता अब भी खयालों में तुझे, पुरानी बात वो दिल के लगाने हो गए। 

मैं भूल गया

मैं भूल गया जीवन के सुंदर, और रंगीन नज़ारो मे। मैं भूल गया, मैं भटक गया, कलिओं की मस्त बहारो मे। प्यार दुलार की नौटंकी, अब भी छलती भरमाती है, जीना मुश्किल है दूर यहाँ, सुधियों के कारागारों में। मरता, मरकर भी खैर नहीं, ये यूँ ही पूजा जाता है, सोता है ऐसे प्रेम यहाँ, ज्यों सोता पीर मज़ारों में। तुम देखो वैसा ही पाओगे, जैसा मैं चिर से दिखता हूँ, पे होता पल पल परिवर्तित, ज्यों बदले रेत किनारों में।

छन्द : एक परिचय

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छंद क्या है ? छंद साँचा है, विशेष पैटर्न है, नियमों से नियोजित पद्य रचना है जिसकी पहचान मात्राओं व वर्णों की गिनती, उनका क्रम, लय आदि से की जाती है | उदहारण के लिए दोहा, चौपाई, सोरठा आदि छंद हैं | छंदों के कुछ उदहारण – अनुष्टुप् छंद           वर्णानामर्थसङ्घानां रसानां छन्दसामपि |           मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ||  (रामचरितमानस १.१.१) चौपाई छंद           जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।।           सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।           जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ।।           चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई।। (रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड) दोहा          खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।          तन मेरो मन पीउ को दोउ भए एक रंग।। (अमीर खुसरो) कुण्डलिया ...

तैत्तिरीयोपनिषद

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कृष्ण यजुर्वेद शाखा का यह उपनिषद तैत्तिरीय आरण्यक का एक भाग है। इस आरण्यक के सातवें, आठवें और नौवें अध्यायों को ही उपनिषद की मान्यता प्राप्त हैं इस उपनिषद के रचयिता तैत्तिरि ऋषि थे। इसमें तीन वल्लियां- ‘शिक्षावल्ली,’ ‘ब्रह्मानन्दवल्ली’ और ‘भृगुवल्ली’ हैं। इन तीन वल्लियों को क्रमश: बारह, नौ तथ दस अनुवाकों में विभाजित किया गया है। जो साधक ‘ज्ञान,’ ‘कर्म’ और उपासना’ के द्वारा इस भवसागर से पार उतर कर मोक्ष की प्राप्ति करता है अथवा योगिक-साधना के द्वारा ‘ब्रह्म’ के तीन ‘वैश्वानर’, ‘तेजस’ और ‘प्रज्ञान’ स्वरूपों को जान पाता है और सच्चिदानन्द स्वरूप में अवगाहन करता है, वही ‘तित्तिरि’ है। वही मोक्ष का अधिकारी है। शांति-पाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः . शं नो भवत्यर्मा . शं न इन्द्रो बृहस्पतिः . शं नो विष्णुरुरुक्रमः . नमो ब्रह्मणे . नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षम् ब्रह्मासि . त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि . ऋतं वदिष्यामि . सत्यं वदिष्यामि . तन्मामवतु . तद्वक्तारमवतु . अवतु माम् . अवतु वक्तारम् . ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः . मित्र – दिन और प्राण के अधिष्ठाता वरुण- रात्रि और अपान के अध...

मम्मा तुम न समझौ

कैसी लबरी शान, मम्मा तुम न समझौ। जनता दे रइ प्रान, मम्मा तुम न समझौ। चौरे चकरे गोला डर गए नइयाँ गाड़ी-वान, मम्मा तुम न समझौ। सूका परौ बितर दये पइसा कक्कू खा गए पान, मम्मा तुम न समझौ। डेओडी-डेओडी पानी मांगत औंदे डरे किसान, मम्मा तुम न समझौ। आरच्छन की न्याव मचा लई दूषित छुओ पिसान, मम्मा तुम न समझौ।